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तैमूर लंग के काल मे शुरू हुई भारत मे मुहर्रम मनाने की परंपरा


■ मजबूर होकर इमामे हुसैन को कर्बला की जंग मे अपने 72 साथियों के साथ लड़ाई लड़नी पड़ी

तरीकत हुसैन
लोहरौली संतकबीरनगर। पैग़ंबरे इस्लाम के नवासे हजरत इमाम हुसैन के खातिर ही अपने नाना के शहर मदीना को अलविदा कह दिया था क्योंकि उन्हें यह कत्तई गवारा नहीं था कि यजीदी फौज उनके नाना के शहर मे दाखिल होकर बेगुनाहों का खून बहाए।वह किसी भी हालात मे जंग को टालना चाहते थे लेकिन यजीद का हुक्म था कि इमाम हुसैन उसे अपना राजा स्वीकार करते हुए राज्य को धार्मिक मान्यता भी प्रदान करें।हजरत हुसैन उसे इस्लामी राज्य के राजा के रूप मे हरगिज स्वीकार नहीं करना चाहते थे।क्योंकि वे जानते थे कि यदि उन्होंने हजरत मोहम्मद के नवासे होने के बावजूद यजीद के साम्राज्य अथवा उसकी सान्य शक्ति से डरकर उसे इस्लामी राजा के रूप मे मान्यता दे दी तो भविष्य में इतिहास इस बात का जिक्र करेगा कि यजीद जैसा दुष्चरित्र व अत्याचारी व्यक्ति हजरत मोहम्मद के परिवार से सम्बन्ध रखने वाले उनके नाती हजरत हुसैन के हाथों मान्यता प्राप्त मुस्लिम शासक था। ना चाहते हुए भी मजबूर होकर इमामे हुसैन के नाहक के खिलाफ कर्बला की जंग मे अपने 72 साथियों के साथ लड़ाई करनी पड़ी। एक एक करके सारे साथियों के साथ इमाम हुसैन भी शहीद हो गए लेकिन अपने इस्लाम के उसूलो के साथ समझौता नही किया।इसीलिए तो किसी शायर ने लिखा है कि इस्लाम का जहाज था तूफा की गोद मे,खुद डूबकर लहू मे बचाया हसैन ने।
मोहर्रम का महीना इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 साथियों व परिजनों की कर्बला में हुई शहादत को याद करते हुए मनाया जाता है। इतिहास के अनुसार यजीद छठी शताब्दी में अरबी जगत का स्वघोषित शासक बन बैठा वह अत्यंत दुश्चरित्र अत्याचारी तथा गैर इस्लामिक गतिविधियो में संलिप्त रहने वाला बादशाह था। उधर हुसैन एक सच्चे नेक,धर्मपरायण मानवता प्रेमी व्यक्ति थे।यज़ीद जैसा अधर्मी व अत्याचारी शासक हजरत हुसैन से इस बात की उम्मीद रखता था कि वे उसे अपना राजा स्वीकार करते हुए उसके राज्य को इस्लामी और धार्मिक मान्यता भी प्रदान करे।हजरत हुसैन उसके इस्लाम विरोधी क्रिया कलापों के कारण राज्य के राजा के रूप में हरगिज स्वीकार नही करना चाहते थे। वे जानते थे कि यदि उन्होंने हजरत मोहम्मद के नवासे होने के बावजूद यजीद के साम्राज्य अथवा उसकी सैन्य शक्ति से डरकर उसे इस्लामी राजा के रूप में मान्यता दे दी तो भविष्य में इतिहास इस बात का ज़िक्र करेगा कि यजीद जैसा दुष्चरित्र व अत्याचारी व्यक्ति हजरत मोहम्मद के परिवार से सम्बंध रखने वाले उनके नाती हज़रत हुसैन के हाथों मान्यता प्राप्त मुस्लिम शासक था। इसी प्रतिरोध के चलते यह विवाद कर्बला की रक्तिरनजित्त घटना पर आकर खत्म हुआ।कर्बला में यजीद की विशाल सेना ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार के 72 लोगो को एक -एक कर शहीद कर दिया।शहादत पाने वालों में से 6 महीने के बच्चे से लेकर 80 वर्ष के बुजुर्ग तक का नाम इतिहास में दर्ज है।यह लड़ाई असत्य के विरुद्ध थी लेकिन इसमें जालिम यजीद की सेना ने हजरत इमाम हुसैन व उनके साथियों को शहीद कर क्षड़िक रूप से तलवारों व सिंहासन की जीत तो जरूर हासिल करली परन्तु हजरत इमामे हुसैन को अपने विराट मकसद में पूरी कामयाबी मिली।इसीलिए कहा जाता है कि कल्ले हुसैन असल मे मर्गे यजीद है इस्लाम जिंदा होता है हर कर्बला के बाद।इस्लामी मान्यता के अनुसार यजीद के दौर में हर गैर शरई और गैर इंसानी काम हो रहा था इमाम ने उस समय कहा था मेरे जैसा,यजीद जैसों की कभी भी बैयत नही कर सकता इमाम का यह संदेश रहती दुनिया तक कायम रहेगा दुनिया को यह समझ लेना चाहिए हर दाढ़ी वाला मुसलमान नहीं होता है।अगर उसके अंदर इंसानियत है और वह हक की बात करता है तभी उसे मुसलमान कहलाने का हक है।जिसके हाथ व जुबान से इंसान महफूज रहे वही सच्चा मुसलमान है।
मुहर्रम इस्लामी हिज़री सन का पहला महीना है।पूरी इस्लामी दुनिया मे मुहर्रम की 9 और 10  तारीख को रोजा रखते है और मस्जिदों व घरों में इबादत की जाती है।क्योंकि ये तारीख इस्लामी इतिहास की बहुत खास तारीख है रहा सवाल भारत मे ताज़ियादारी का तो यह एक शुद्व भारतीय परंपरा है। जिसका इस्लाम से कोई ताल्लुक नही है।ताजिया की शुरुआत बरसो पहले तैमूर लंग बादशाह ने की थी।जिसका ताल्लुक शिया संप्रदाय से था।तब से भारत के शिया और कुछ क्षेत्रों में हिन्दू भी ताजियो(इमाम हुसैन की कब्र कि प्रतिति,जो इराक के कर्बला नामक स्थान पर है)की परंपरा को मानते या मनाते आ रहे है।भारत मे ताजिए के इतिहास और बादशाह तैमूर लंग का गहरा रिश्ता है।
तैमूर बरला वंश का तुर्की योद्धा था और विश्व विजय उसका सपना था।सन 1336 को समरकंद के नजदीक केश गांव ट्रांस अक्सानिया (अब उज्बेकिस्तान) में जन्मे तैमूर को चंगेज खा के पुत्र चुगताई ने प्रशिक्षण दिया।सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में ही वह चुगताई तुर्को का सरदार बन गया।फारस अफगानिस्तान मेसोपोटामिया और रूस के कुछ भागों को जीतते हुए तैमूर भारत(1398) पहुँचा।उसके साथ 98000 सैनिक भी भारत आए।दिल्ली में महमूद तुगलक से युद्ध कर अपना ठिकाना बनाया और यही उसने स्वंय को सम्राट घोषित किया।तैमूर लंग तुर्की शब्द है जिसका अर्थ,तैमूर लंगड़ा होता है तैमूर दाए हाथ और बाएं पाव से पंगू था।तैमूर लंग शिया संप्रदाय से था और मुहर्रम माह में हर साल इराक जरूर जाता था लेकिन बीमारी के कारण एक साल नही जा पाया।वह ह्रदय रोगी था इसलिए हकीमों ने उसे सफर के लिए मना किया था।बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों कुछ ऐसा करना चाहा जिससे तैमूर खुश हो जाए।उस जमाने के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रौजे(कब्र)की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया।कुछ कलाकारों ने बॉस की किमचियो की मदद से कब्र,या इमाम हुसैन की यलगार का ढांचा तैयार किया इसे तरह तरह के फूलों से सजाया गया।इसी को ताजिया नाम दिया गया।ताजिए को पहली बार 801 हिज़री में तैमूर लंग के महल परिसर में रखा गया।तैमूर की ताजिए की धूम बहुत जल्द पूरे देश में मच गई।देशभर से राजे रजवाड़े और श्रधालू जनता इन ताजियो की जियारत (दर्शन) के लिए पहुचने लगे।तैमूर लंग को खुश करने के लिए देश की अन्य रियासतों में भी इस परम्परा की सख्ती के साथ शरुआत हो गई।
खास तौर पर दिल्ली के आस पास के शिया सम्प्रदाय के नवाब थे,उन्होंने ने तुरंत इस परम्परा पर अमल शुरू कर दिया तक से लेकर आज तक इस अनूठी परंपरा भारत,पाकिस्तान,बंगलादेश और वर्मा(म्यामार) में मनाया जा रहा है। जबकि खुद तैमूर लंग के देश उज्बेकिस्तान या कजाकिस्तान मेंशिया बहुल देश ईरान में ताजियो की परंपरा का कोई उल्लेख नही मिलता है।68 वर्षीय तैमूर शुरू की गई ताजियो की परंपरा को ज्यादा देख नही पाया और गंभीर बीमारी में मुब्तिला होने के कारण 1404 में समरकंद लौट गया।बीमारी के बावजूद उसने चीन अभियान की तैयारियां शुरू की लेकिन19 फरवरी 1405 को ओटरार चिमकेंट के पास (अब शिमकेंट,कजाकिस्तान) में तैमूर का इन्तेकाल (मृत्यु)हो गया। तैमूर लंग के भारत से जाने के बाद भी भारत मे यह परंपरा जारी रही।तुगलक तैमूर वंश के बाद मुगलों ने भी इस परंपरा को जारी रखा।मुगल बादशाह हुमायूं ने सन हिज़री 962 में बैरम खा से 46 तौला के जमुर्रद का बना ताजिया मंगवाया था।कुल मिलकर ताजिया का इस्लाम से कोई खास ताल्लुक ही नही है।लेकिन कुछ लोग इस काम को आज भी पुण्य (सवाब)समझ कर आज भी करते है।

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